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Saturday, 2 April 2016

राजनीति !!


राजनीति !!



        मूल्यरहित राजनीति के दौर में भी शुचिता व नैतिक मूल्यों का जीवन व्यतीत करने वाले जनप्रिय नेता, आदरणीय अटल जी को शुभ जन्म दिवस पर हार्दिक बधाइयाँ व शुभ कामनायें ।।
     1987 के आसपास की बात है तब बी जे पी का उत्तराखंड में खास जनाधार न था.माननीय अटल जी जनाधार मजबूत करने उत्तराखंड के तूफानी दौरे पर थे. रंवाई क्षेत्र की बात है उत्तराखंड राज्य हेतु जन मानस में उत्सुकता थी.
       एक जिज्ञासु ने माननीय अटल जी से उत्तराखंड राज्य गठन के सम्बन्ध में समर्थन व विचार जानने चाहे तो ..
      अटल जी ने पूछा, " आपको आखिर अलग उत्तराखंड राज्य क्यों चाहिए ?"
      प्रश्नकर्ता ने त्वरित उत्तर दिया, " हमारे यहाँ से लखनऊ की दूरी बहुत अधिक है और हमें हर काम के लिए लखनऊ जाना पड़ता है, बहुत समय और धन की आवश्यकता होती है !! " (तब उत्तराखंड राज्य गठन नही हुआ था तो उत्तराखंड वासियों को सचिवालय, उच्च न्यायालय आदि के काम से लखनऊ जाना होता था)
      माननीय अटल जी का इस तरह की मन स्थिति पर करारा जवाब था .. इस तरह तो फिर आप यह भी कहने लगेंगे .. यहाँ से दिल्ली बहुत दूर है !!!
     क्या आज की तुष्टिकरण द्वारा वोट बैंक की राजनीती में, इस तरह का जवाब कोई राजनेता दे सकने की कुव्वत रखता है ?? मुझे संदेह है !!!..
    माननीय अटल जी आपको व आपकी राष्ट्रीय अखंडता को समर्पित,राष्ट्रवादी सोच हेतु कोटिश: सादर नमन..
      उसी दौरान मुझे उत्तरकाशी निरीक्षण भवन में जन प्रिय नेता श्री अटल जी का करीब से साक्षात्कार करने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ था.
सोचता हूँ दलगत राजनीती से हटकर राष्ट्रवादी चिंतकों को अवश्य याद किया जाना चाहिए जिससे अगली पीढ़ी को प्रेरणा व संस्कार प्राप्त हों .
 
 

निट्ठल्ला चिंतन !!



निट्ठल्ला चिंतन !!

                 व्याकरणाचार्यों ने हर युग में और मानव की रग-रग प्रचुरता से व्याप्त व लोकप्रिय “निंदा रस” को प्रेम, श्रृंगार, वीर, रौद्र आदि रसों के साथ स्थान न देकर न जाने क्यों सदैव भेदभाव किया !! सृष्टि की उत्पत्ति से निरंतर इस रस के द्वारा पीड़ित व्यक्ति अपने मन के गुबार को बाहर निकालता है।     
          कभी-कभी व्यक्ति की स्वार्थ-सिद्धि में जिसने बाधा पहुँचाई, उसी के विरोध में रस के माध्यम से वह अपने गुबार को बाहर निकालता है. व्यक्ति के अंतर्मन को शांति पहुँचाने में इस रस की महती भूमिका है !!
          संभवत: वैचारिक आदान-प्रदान के दौरान जब किसी व्यक्ति यासमूहों की स्वार्थ-सिद्धि न हो पाई होगी तब इस रस की उत्पत्ति अंतर्मन से हुई होगी ! वैचारिक असमानता के कारण व्यक्तिगत स्वार्थों की तुष्टि न हो पाने की स्थिति में इस रस में भीगे तीक्ष्ण बाण पूरे समाज को ‘भेदन, कर सकने की अतुल्य सामर्थ्य रखते हैं!!
        बड़े-बड़े रजवाड़ों को छिन्न-भिन्न करने वाले इस रस से भीगे बाणों का कैकयी द्वारा प्रयोग और उनकी तीक्षणता और अचूक भेदन क्षमता पर भला कौन प्रश्न चिह्न लगा सकता है !! और तो और माता सीता के सतीत्व पर प्रश्न चिह्न भी इसी रस की परिणति थी !
        खैर ये तो गुजरे ज़माने की बातें हो गयी. आजकल ऑफिसों, कंपनियों में जिस कर्मचारी के पास इस रस का भण्डार है और सही समय पर यदि उसे इस रस में भिगोकर सही समय पर तीर चलाने में निपुणता है !! तो बिना काम किये वह अधिकारियों का कृपापात्र, विश्वास पात्र और आँखों का तारा बना रहता है !   राजनीतिक दलों व उनके समर्थकों में योग्यता की पहली पायदान “निंदा रस” में निपुणता ही है !!
        लगता है मैं भी कहीं न कहीं इस रस की महानता को दरकिनार कर रहा हूँ ! खैर मुद्दे पर आता हूँ इस रस का परोक्ष प्रयोग, स्वस्थ मनोरंजन एवं समय व्यतीत करने का सरल व सुलभ साधन है.क्या विद्वान् ! क्या अविद्वान !!सभी इस रस के छलकते प्यालों को देखकर रस को उदरित करने का लोभ संवरण नही कर पाते !! एक संयुक्त परिवार से कई एकल परिवार निर्माण में तो इस रस का कोई भी रस बराबरी नही कर सकता !!
      आलेख कुछ दीर्घ सूत्री सा होता प्रतीत हो रहा है !! बस यह कह कर अपनी बात को विराम देना चाहूँगा कि अंतर्मन की शांति को ही वास्तविक शांति कहा गया है और मानव की रग-रग में व्याप्त, अतुल्य सामर्थ्यवान “ निंदा रस “ इस कसौटी पर हर तरह से खरा उतरता है !!! तो क्यों न इस रस को अन्य रसों की तरह सम्मानित स्थान प्रदान किया जाय !! 

स्वस्थ व समृद्ध विरासत : संक्रमण काल



स्वस्थ व समृद्ध विरासत : संक्रमण काल

          पारंपरिक संगीत व नृत्य किसी भी संस्कृति के दर्शन हेतु स्वच्छ व स्पष्ट दर्पण होता है, आधुनिकता की ओट में व्यावसायिक मनोवृत्ति के तुष्टिकरण हेतु लोक संगीत में हिंदी फिल्मों की फूहड़ता का मिश्रण, उत्तराखंड की समृद्ध संस्कृति पर कुठाराघात है जो सामाजिक सहिष्णुता व समरसता में धीमे जहर की तरह नकारात्मक योगदान दे रहा है, इस कारण यह गंभीर चर्चा व चिंता का विषय बन गया है, संक्रमण काल में ही, समय रहते, समाज के प्रबुद्ध व नेतृत्व करने वाले वर्ग द्वारा समृद्ध विरासत को बचाए के लिए, फूहड़ता को तहेदिल से हतोत्साहित किया जाना अति आवश्यक है. इससे समाज में सकारात्मक सन्देश पहुंचेगा जिससे कलाकार,सकारात्मक सृजन की ओर उन्मुख होंगे ..
        ऐसा नही कि फूहड़ता भरा संगीत और नृत्य, पारंपरिक संगीत और नृत्य पर पूर्णतया हावी हो चुका है, आज भी शादी, पार्टी आदि में आधुनिक बैंड बाजों के मुकाबले,पारंपरिक वाद्ययंत्रों के स्वरों (ढोल-दमाऊ और मूसकबाजा) पर स्वाभाविक रूप से थिरकने वालों की संख्या अधिक ही देखने को मिलती है. आखिर संख्या अधिक क्यों न हो !! जन्म-जन्मान्तर से जो संगीत रग-रग में रचा-बसा है उस पर मन स्वाभाविक रूप से मयूर नाच उठता है और इस स्वाभाविक थिरकन से तन और मन, दोनों, हल्का महसूस करते है.


Wednesday, 30 March 2016

" सेतु “



" सेतु “

         “ देख !! तपती गर्मी में भाई स्कूल से आये हैं !! जल्दी से भाइयों के लिए ठंडी लस्सी बना और खाना परोस !!! “ तपती गर्मी में स्कूल से आई टपकते पसीने को पोंछती नेहा ने अभी घर के अन्दर कदम भी नही रखा था कि पड़ोसन से गप्पे करती माँ तल्ख़ लहजे में बोली. नेहा के लिए ये सब कोई नयी बात नहीं थी. लेकिन मन ही मन सोचती कि वो भी तो तपती गर्मी में भाइयों की तरह ही स्कूल से आती है !!
          आज नेहा मन ही मन खुश थी, भाइयों की जिद्द पर ही सही घर पर दो-चार नहीं !! पूरे बारह समोसे आये थे !! लेकिन ये क्या !! माँ ने सारे समोसे दोनों भाइयों को ही दे दिए !! नेहा ललचाई से टुकुर-टुकुर भाइयों को समोसे खाते देख रही थी !! हमेशा की तरह उसके हिस्से में समोसों की टूटी सख्त किनारी ही आ सकी !! मन मसोस का रह गयी नेहा !! कह भी क्या सकती थी माँ ने बचपन से ही पहले भाइयों को मन भर कर खिला कर बाद में जो बच जाए उसे खाकर संतोष कर लेने का “संस्कार “ ये कहते हुए डाल दिया कि “लड़की जात है पता नही ससुराल कैसी मिले !! फिर ससुराल वाले हमें उलाहना देते फिरेंगे !! “
              इन्ही सब हालातों में बचपन कब पंख लगाकर उड़ गया, नेहा को अहसास ही न हुआ !! वह ब्याह कर ससुराल आ गयी. विवाह की औपचारिकताओं के बाद, अगले दिन मुंह अँधेरे ही सुबह उठकर घर के काम में लग गयी, सासु माँ उसे रोकती पर वो सहजता और तन्मयता से फिर से काम में लग जाती. भोजन का समय हुआ तो डाइनिंग टेबल पर सबके लिए खाना करीने से लगा स्वयं मायके में मिले, सबसे अंत में खाने के “संस्कार” का अनुसरण करती हुई रसोई में बचा-खुचा काम निपटाने लगी !!
      “ नेहा !!..नेहा !!!” नेहा को रसोई में गए कुछ ही समय हुआ था कि सासू माँ की ऊंचे स्वर में आवाज सुनाई दी !! नेहा का तो घबराहट से बुरा हाल था !! मन ही मन नकारात्मक बातें ही उसके मन में आ रही थी .., पता नही खाना बनाने में उससे क्या गलती हो गयी ??. अब तो, उसको और उसके मायके वालों को क्या-क्या उट पटांग सुनने को मिलेगा !! खैर डरी-सहमी और सिकुड़ी, डाइनिंग टेबल के पास अपराध बोध में, नजरें झुकाकर, सासु माँ के पास जाकर मूर्तिवत खड़ी हो गयी, लगभग हकलाते हुए घबराहट भरे स्वर में बोली, “ जी...जी .. माँ जी “
         ” हम कब से, साथ में भोजन करने के लिए तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं !! कुर्सी सरकाकर नेहा के लिए जगह बनाती सासु माँ ने शिकायती मगर ममता भरे लहजे में कहा. वह सांसत में थी !! मायके में मिले “संस्कारों” की दुहाई देती है तो मायके वालों के बारे में पता नही क्या-क्या उल्टा सोचेंगे !! “ लाइए, माँ जी.. .आप आराम से बैठिये, मैं परोस लेती हूँ !! नेहा स्वयं को सहज व संयत करने का प्रयास करती हुई. भोजन परोसने लगी !!
         सासु माँ के इस अपनत्व भरे व्यवहार पर नेहा के आँखों में ख़ुशी के आंसू आने को थे !! लेकिन मायके के “संस्कारों “ की खिल्ली न उड़ाने लगें, मन ही मन यह सोचते हुए वो आंसुओं को छिपाने के प्रयास में स्वयं से लगातार जूझ रही थी.
          शायद ! आज नेहा को अपने अस्तित्व व महत्व का करीब से अहसास हुआ था !! लेकिन वो अब भी मायके और ससुराल, दो परिवारों के बीच, सम्मान और संबंधों का मजबूत " सेतु “ बना रहना चाहती थी .......... ^^ विजय जयाड़ा ..23.05.14


भोला भाला मासूम बचपन ...



मेरे कैमरे के लैन्स से

भोला भाला मासूम बचपन

 

Friday, 25 March 2016

ए गि फागुण मैना खैला होळि ..



ए गि फागुण मैना खैला होळि ... ए गि फागुन मैना खेळा होळि ..


Friday, 5 February 2016

सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेला, 2016.. फरीदाबाद



सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेला, 2016.. फरीदाबाद

            अरावली पहाड़ियों पर 1987 से प्रारंभ किये गए “सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेला” के बाद, प्रागैतिहासिक काल अवशेषों से जुड़े सूरजकुंड क्षेत्र ने अंतर्राष्ट्रीय मानचित्र पर हस्त शिल्प व पुरा अवशेषों के क्षेत्र में अपनी विशेष पहचान बना ली है. मेले की लोकप्रियता का अंदाजा इन आंकड़ों से लगाया जा सकता है कि गत वर्ष कुल 12 लाख पर्यटक मेले में आये इनमे से एक लाख साठ हजार विदेशी पर्यटक थे..
           दिल्ली हरियाणा सीमा से लगे सूरजकुंड में ग्रामीण परिवेश के महकते वातावरण में 1 फरवरी से 15 तक चलने वाले इस मेले में कई देशों के हस्तशिल्प स्टाल लगे हैंऔर भारत के विभिन्न राज्यों के हस्त शिल्पी अपने हुनर का प्रदर्शन कर रहे हैं. जिससे स्वदेशी हस्त शिल्पियों को अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिल रही है.
         अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था के बीच चल रहे मेले में, पसंद आने पर आप हस्त शिल्प की वस्तुएं खरीद सकते हैं. दर्शकों के लिए पारंपरिक मनोरंजन के साधनों के अतिरिक्त विभिन्न मंडपों पर स्वदेशी व विदेशी कलाकारों के साथ बिंदास थिरक सकने व वाद्य यंत्रों को बजा कर आनंद ले सकने की भी व्यवस्था है..
        सांस्कृतिक मंच.." चौपाल " पर समय देना न भूलियेगा , यहाँ पर प्रतिदिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर के देशी व विदेशी कलाकार अपनी स्वस्थ सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम मेले में होने वाली थकान को दूर करने में पूर्ण समर्थ हैं.
सप्ताह के सामान्य दिनों में मेले में प्रवेश हेतु टिकट दर 80 रुपये औए सप्ताहांत दिनों में 120 रुपये है.
          सोचता हूँ यदि उत्तराखंड में भी इस तरह की पहल हो तो वहाँ के हस्त शिल्पियों को राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिल सकती है जिससे प्रदेश का पर्यटन व हस्त शिल्प राजस्व भी बढ़ सकता है।
क्षेत्र के पुरातन इतिहास व पुरातन अवशेषों के सम्बन्ध में फिर कभी साझा करूँगा ..