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Monday, 27 August 2018

लम्हों ने खता की थी..


बैठे ठाले .... ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर 
इलैक्ट्रोनिक मीडिया जब से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से व्यवस्था के गुण गान करने वाला और व्यवस्था के अनुरूप नकारात्मक ख़बरों का भोंपू बन गया तब से मैंने टी वी देखना छोड़ दिया. इनका काम है येन केन प्रकारेण मुनाफा कमाना ! बेशक उनके द्वारा प्रसारित व्यवस्था को पोषित करती ख़बरें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से समाज को नकारात्मक रूप से प्रभावित क्यों न करती हों ! तो भला हम क्यों स्वयं में निगेटिविटी को प्रश्रय दें ! 
आलम ये है कि गप-शप की चौपाल, सोशल मीडिया भी भावुक नागरिकों के माध्यम से इन भोंपुओं की गिरफ्त में आने लगा है. यहाँ भी हर राजनीतिक दल का एक अलग किला नज़र आता है ! जिनमें उनके सैनिकों के साथ वस्तु स्थिति से अनभिज्ञ आम नागरिक भी खड़ा नज़र आता है ! अलग-अलग राजनीतिक दलों के आई टी सेल उन किलों में तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर सामग्री के रूप में असलाह बारूद मुहैय्या करवा रहे हैं. आपसदारी खत्म होती जान पड़ती है ! प्रायः हर कोई एक भोंपू लिए और अपने किले की सुरक्षा में बंदूक ताने खड़ा है !
हर काल में किलों से बाहर सूफी विचारक रहे वे व्यवस्था की आक्रामकता या चकाचौंध से प्रभावित हुए बिना तथ्यपूर्ण और तर्क संगत दृष्टिकोण से चौपालों में अपनी बात को बेखौप रखते थे. किलेबंदी की मन: स्थिति से हटकर हर कोई उनकी बात को सम्मान दिया जाता था और मनन भी किया जाता था.. इसी तरह के लोगों ने भटके हुए लोगों और समाज को नयी दिशा भी दी .. लेकिन अब देखता हूँ स्थिति उलट है ! अब ऐसे सूफियों को ही संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा है ! भटके हुए समाज को दिशा देने वाले लोगों पर ही प्रहार किया जा रहा है . उनका मखौल उड़ाया जा रहा है ! अक्सर कहा जाता है.. “ बी पॉजिटिव “ लेकिन जब केवल नकारात्मक ही परोसा जाय तो साधनों के अभाव से जूझता आम नागरिक कब तक .. बी पॉजिटिव “ पर टिका रह सकता है !.
पहले और अब भी अपने स्वार्थों के चलते विदेशी शक्तियां स्व पोषित दलालों से भड़काऊ बयानबाजी या कार्य करवाकर देश में क्षेत्रीय, धार्मिक, जातीय व भाषाई अफरा तफरी और असुरक्षा का वातावरण बनाने की कोशिश करती थी .. लेकिन मुझे कहने की जरुरत नहीं !! आज उनका काम बहुत आसान हो गया है आज वही काम ............... !! 
आखिर हम किस तरफ जा रहे हैं ? क्या दल गत किलेबंदी के चलते हम उसी युग में तो नहीं पहुँच रहे हैं.. सेना में भी सैनिकों के अलग-अलग चूल्हे हुआ करते थे और विदेशी आक्रान्ताओं ने उसका फायदा उठाया ! येन केन प्रकारेण अपने स्वदेशी राजाओं को हारने के लिए विदेशी बहशियों से समझौते किये ! इन मौका परस्त राजाओं और आम जनता का हश्र क्या हुआ ? इससे हम अनभिज्ञ नहीं !!
राजनीतिक आस्था, व्यक्ति आवश्यकताओं और परिस्थितियों के अनुरूप बदलती रहती हैं ... यदि ऐसा न होता तो एक ही दल की सरकार बनी रहती ! सोचता हूँ धरातल पर हमें एक ही बना रहना चाहिए .. धार्मिक अन्धता के चलते धर्म क्षेत्र में आशाराम, राम रहीम जैसे व्यक्ति पूजित होने लगते हैं.. राजनीति में भी कमोबेश इसी आचरण के लोग आने लगे हैं जो भावना प्रधान भारतीय समाज का भावनात्मक दोहन करने का हुनर रखते हैं.. उनसे हमें सावधान रहने की आवश्यकता है ! राजनीतिक मतभेद और मतैक्य देश काल माहौल से प्रभावित अवश्य हो सकते हैं लेकिन हर परिस्थिति में विवेक का रोशनदान खुला रखना भी जरूरी है. जिससे भविष्य में अपनी मानसिक अन्धता के लिए पछतावा न करना पड़े .. 
ऐसा न हो कि आने वाली पीढ़ियां भोंपू वाद के समर्थक होने के लिए हमें कोसें !
हम सभी को परम् पिता ने ज्ञानेन्द्रियाँ दी हैं ! भला हम किसी का भोंपू क्यों बनें ! क्यों हम किसी के पिछलग्गू बनें !! सोचता हूं भोंपू बनने से बेहतर, स्व विवेक से सार्थक चर्चा का हिस्सा बनना है।
भावना प्रधान होना मानव सुलभ गुण है लेकिन भावनाओं में बहकर कहीं फिर ऐसा न हो... " लम्हों ने खता की थी... सदियों ने सजा पायी !

राजशाही और लोकतंत्र



         ये तो है राजशाही के दौर में प्रयोग किये जाने वाले भालों का संग्रह मगर ये सब देखकर सोचता हूँ कि...
राजशाही में चारणों द्वारा महिमामंडन करवाकर राजाओं को आम जन के मध्य देव रूप में स्थापित किया जाता था !
लोकतंत्र में मीडिया व चाटुकारों द्वारा मिथ्या यशोगान करके नेताओं को आम जन के मध्य देव रूप में स्थापित करने का प्रयास किया जाता है !!
इस तरह राजा व नेता समतुल्य ही हुए.
तो फिर राजशाही और लोकतंत्र में अंतर ?


Saturday, 15 October 2016

सन १८०३ से जयाड़ा वंश वृक्ष


सन १८०३ से जयाड़ा वंश का विवरण निम्न प्रकार से है:-
श्री शोबन सिंह जयाड़ा जी के तीन पुत्र थे.
१.कीडू सिंह
२.शीशु सिंह
३.मंगल सिंह
कीडू सिंह- १.भूप सिंह २. केशरा सिंह
शीशु सिंह
पहली पत्नी-१. लालू सिंह
दूसरी पत्नी-१. जूणा सिंह
मंगल सिंह
पहली पत्नी-१. बन्नू सिंह
दूसरी पत्नी-१. केदारू सिंह
कीडू सिंह के वंशज
१.भूप सिंह २. केशरा सिंह
भूप सिंह
पहली पत्नी-१. हौंसू सिंह २. बन्या सिंह
दूसरी पत्नी-१. बाला सिंह २. गौळ सिंह
केशरा सिंह
१. लूथी सिंह २. जुपल सिंह ३. ग्याड़ू सिंह
हौंसू सिंह- १. माधो सिंह २. जोगी सिंह
बन्या सिंह- १. कंठू सिंह २. नैन सिंह
बाला सिंह- १. लूद्र सिंह २. औगड़ सिंह
गौळ सिंह- १. जीता सिंह
लूथी सिंह- १. खेम सिंह २. बचन सिंह ३. धर्म सिंह ४. फ़ते सिंह
जुपल सिंह- १. शिव सिंह २. गैणु सिंह
ग्याड़ू सिंह- १. कंठी सिंह २. सब्बल सिंह
माधो सिंह
पहली पत्नी-१. श्याम सिंह
दूसरी पत्नी-१.चन्द्र सिंह २. सुन्दर सिंह ३. कुंदन सिंह ४ प्रेम सिंह
जोगी सिंह-१. गुलाब सिंह २. कुशाल सिंह ३. बादाम सिंह
कंठू सिंह- १. भूरा सिंह २. फ़ते सिंह
नैन सिंह-
पहली पत्नी-१.जगत सिंह
दूसरी पत्नी-१.चतर सिंह २. नेत्र सिंह ३. अतर सिंह ४. राजेंदर सिंह ५. बलवंत सिंह ६. सुभाष सिंह ७. ज्योति सिंह
लूद्र सिंह-१. बच्चू सिंह २. जवाहर सिंह
औगड़ सिंह- १. सत्ये सिंह २. इन्द्र सिंह ३. प्रताप सिंह
जीता सिंह- १. गुमान सिंह
खेम सिंह- १.हीरा सिंह २. बीरा सिंह ३. सुन्दर सिंह ४. मकान सिंह
बचन सिंह- १. तेज प्रताप सिंह २. प्रकाश सिंह
धर्म सिंह- १. नागेन्द्र सिंह २. प्रकाश सिंह
फ़ते सिंह- १. दयाल सिंह २. गोबिंद सिंह ३. मान सिंह
शिव सिंह- १. गुलाब सिंह २. शोबन सिंह
गैणु सिंह(कोई पुत्र नहीं)
कंठी सिंह- १. मोहन सिंह
सब्बल सिंह- १. सोहन सिंह २. चन्दन सिंह
श्याम सिंह-१. दीवान सिंह २. हिम्मत सिंह
चन्द्र सिंह
पहली पत्नी- १. उमेद सिंह
दूसरी पत्नी- १. रमेश सिंह २. दिनेश सिंह
सुन्दर सिंह- १. भगवान सिंह २. त्रिलोक सिंह ३. प्रवीण सिंह
कुंदन सिंह- १. जगमोहन सिंह २. बिजेंद्र सिंह
प्रेम सिंह-१. उत्तम सिंह २. सोहन सिंह
गुलाब सिंह-१. भीम सिंह
कुशाल सिंह-१.महावीर सिंह
बादाम सिंह-१. बलबीर सिंह २. रवि सिंह
भूरा सिंह- १. कुंवर सिंह २. कमल सिंह ३. बिक्रम सिंह
फते सिंह-
पहली पत्नी- १. जबर सिंह २. बिरेन्द्र सिंह ३. दर्मियान सिंह
दूसरी पत्नी- १. जोत सिंह २. गबर सिंह ३. ऊदे सिंह
जगत सिंह- १. यशपाल सिंह २. अरबिंद सिंह
चतर सिंह-१. राजपाल सिंह
नेत्र सिंह- १. रोजन सिंह २. मनोज सिंह
अतर सिंह-(सर्प के काटने से मृत्यु)
राजेंदर सिंह- नाम उपलब्ध नहीं
बलवंत सिंह- नाम उपलब्ध नहीं
सुभाष सिंह-नाम उपलब्ध नहीं
बच्चू सिंह-१. सुभाष सिंह
जवाहर सिंह-
पहली पत्नी- १.विनोद सिंह २. त्रिलोक सिंह ३. पान सिंह
दूसरी पत्नी- १. रोशन सिंह
सत्ये सिंह- १. भगवान सिंह २. गोबिंद सिंह
इन्द्र सिंह-१. सुरेंदर सिंह २. विजेंद्र सिंह
प्रताप सिंह-१. सुखदेव सिंह
गुमान सिंह-
पहली पत्नी- १.हुकम सिंह
दूसरी पत्नी- १. शोबन सिंह २. जोत सिंह ३. बिक्रम सिंह
हीरा सिंह-१. सिकंदर सिंह २.त्रिवेंद्र सिंह ३. दिनेश सिंह
बीरा सिंह- १. यशपाल सिंह २. सूरजपाल सिंह ३. गौतम सिंह
सुन्दर सिंह- १. दीपक सिंह २. दिर्घपाल सिंह
मकान सिंह -साधु बन गए
दयाल सिंह-१. अनुज सिंह २. मनोज सिंह
गोबिंद सिंह-१. अंकित सिंह
मान सिंह-१. मनीष सिंह
गुलाब सिंह-१. प्रताप सिंह २. गम्भीर सिंह ३ प्रकाश सिंह ४. चैन सिंह
शोभन सिंह- नाम उपलब्ध नहीं
शीशु सिंह के वंशज
पहली पत्नी- १. लालू सिंह
दूसरी पत्नी- १.जूणा सिंह
लालू सिंह-१. पिनघट सिंह
जूणा सिंह-१. मधु सिंह
पिनघट सिंह-१. छौड़्या सिंह २. अब्लू सिंह
मधु सिंह- १. कुशाल सिंह २. शेर सिंह
छौड़्या सिंह-
पहली पत्नी- १.बच्चू सिंह
दूसरी पत्नी- १.औतार सिंह २. रणबीर सिंह
अब्लू सिंह- १. लाटा सिंह
कुशाल सिंह-१. जय सिंह(रविन में बस गए) २. अतोल सिंह ३. मोर सिंह ४. नारायण सिंह
शेर सिंह- १. हरि सिंह ३. शूरवीर सिंह
बच्चू सिंह- १. मान सिंह
औतार सिंह- १. गोबिंद सिंह २. गजे सिंह
रणबीर सिंह- १. शोबत सिंह
लाटा सिंह- १. उमेद सिंह २. बीर सिंह ३. कल्याण सिंह ४. कुशाल सिंह
अतोल सिंह-१. संत सिंह २. सरदार सिंह
मोर सिंह-१. विजयपाल सिंह २. मान सिंह
नारायण सिंह-१. रतन सिंह २. मथन सिंह ३. लोकेन्द्र सिंह
हरि सिंह-१.हरदेव सिंह २. बलदेव सिंह ३. राम सिंह
शूरवीर सिंह-१. कुलदेव सिंह २. शिवचरण सिंह ३. दिगंबर सिंह
मंगल सिंह के वंशज
पहली पत्नी- १.बनू सिंह
दूसरी पत्नी- १.केदारू सिंह
बनू सिंह-१. चिन्द्रू सिंह २. श्रीचंद सिंह
केदारू सिंह-१. जुणू सिंह
चिन्द्रू सिंह-
पहली पत्नी- १.बद्री सिंह २. सरोप सिंह ३. गोकल सिंह
दूसरी पत्नी- १.अमर सिंह २. रूप सिंह(कोई पुत्र नहीं)
श्रीचंद सिंह-१.
पहली पत्नी- १. भौंपा सिंह
दूसरी पत्नी- १. कंठू सिंह २. मूर्ती सिंह
जुणू सिंह- १. मैन्दर सिंह
बद्री सिंह-१. टंखू सिंह
सरोप सिंह-१. रेबत सिंह २. कुंदन सिंह ३. होशियार सिंह ३. दलेब सिंह (माता की बीमारी से मौत हुई)
गोकल सिंह- १.गुलाब सिंह २. प्रेम सिंह २. दर्शन सिंह
अमर सिंह-१. छौन्दाड़ सिंह २. कल्याण सिंह
कंठू सिंह-१. भैरव सिंह
मूर्ती सिंह-१. मोर सिंह २. मकान सिंह
भौंपा सिंह- १. मक्खन सिंह
मैन्दर सिंह-१. पूरण सिंह २. कुंवर सिंह ३. भगवान सिंह
टंखू सिंह-
पहली पत्नी- १. बुध्धि सिंह
दूसरी पत्नी- १. रमेश सिंह २. महिपाल सिंह ३. जयपाल सिंह ३. मस्तान सिंह
गुलाब सिंह-१. राजेंद्र सिंह
प्रेम सिंह-१. जगमोहन सिंह २. राजेंद्र सिंह ३. रवि सिंह ४. विनोद सिंह
दर्शन सिंह-
पहली पत्नी- १. शोबन सिंह
दूसरी पत्नी- १. जोत सिंह २. आनंद सिंह
रेबत सिंह-१. सुन्दर सिंह २. मोर सिंह ३. रुकम सिंह
कुंदन सिंह-१. *जगमोहन सिंह २. राजेश सिंह
होशियार सिंह-१. त्रिलोक सिंह २. जसबीर सिंह ३. शूरवीर सिंह
छौन्दाड़ सिंह-१. बिक्रम सिंह २. धन सिंह ३. बलबीर सिंह ४. रघुबीर सिंह
कल्याण सिंह-१. सूरत सिंह २. दयाल सिंह ३. सुन्दर सिंह ४. पूर्ण सिंह
भैरव सिंह-१. शूरवीर सिंह २. रुकम सिंह ३. प्रकाश सिंह ४. कलम सिंह
मक्खन सिंह-१.गोबिंद सिंह २. भगवान सिंह ३. दर्मियान सिंह ४. हरदेव सिंह
मोर सिंह-१. राजेंदर सिंह २. सुरेन्द्र सिंह
पूरण सिंह-१. करण सिंह २. भगत सिंह ३ गजपाल सिंह
कुंवर सिंह-१. नत्था सिंह २. मनोज सिंह
भगवान सिंह-१. रविन्द्र सिंह

 साभार :  जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"

Sunday, 11 September 2016

वो भूली दास्ताँ....


तस्वीरें बोलती हैं ....

वो भूली दास्ताँ....लो फिर याद आ गयी ... !!

               अपने साजो-सामान के साथ तसल्ली से प्रतीक्षा बेंच पर बैठकर उबले हुए भुट्टे का आनंद लेते हुए बुजुर्ग महोदय को शायद अचानक कुछ याद आ गया ! और थम कर कुछ सोचने लगे !!
               एक ऑफिस में कर्मचारियों का लंच समय समाप्त होने की प्रतीक्षा में एक बुजुर्ग ..

Monday, 29 August 2016

एक गौरक्षक से भेंट




एक गौरक्षक से भेंट..........

मूर्धन्य व्यंग्यकार श्री हरिशंकर परसाई जी का व्यंग्य, " एक गौरक्षक से भेंट " पढ़ रहा था... व्यंग्य रोचक, सारगर्भित व आज भी प्रासंगिक है। एक अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ .... जिसमें परसाई जी का गौ रक्षक आन्दोलन में सम्मिलित होने जा रहे एक स्वामी जी से संवाद है ___

– स्वामीजी, जहाँ तक मैं जानता हूँ, जनता के मन में इस समय गोरक्षा नहीं है, महँगाई और आर्थिक शोषण है। जनता महँगाई के ख़िलाफ़ आंदोलन करती है। जनता आर्थिक न्याय के लिए लड़ रही है। और इधर आप गोरक्षा-आंदोलन लेकर बैठ गए हैं। इसमें तुक क्या है ?
– बच्चा, इसमें तुक है। तुम्हे अंदर की बात बताता हूंl देखो, जनता जब आर्थिक न्याय की माँग करती है, तब उसे किसी दूसरी चीज़ में उलझा देना चाहिए, नहीं तो वह ख़तरनाक हो जाती है। जनता कहती है – हमारी माँग है महँगाई कम हो, मुनाफ़ाख़ोरी बंद हो, वेतन बढ़े,शोषण बंद हो, तब हम उससे कहते हैं कि नहीं, तुम्हारी बुनियादी माँग गोरक्षा है, आर्थिक क्रांति की तरफ़ बढ़ती जनता को हम रास्ते में ही गाय के खूँटे से बाँध देते हैं। यह आंदोलन जनता को उलझाए रखने के लिए है।
 
 

Wednesday, 6 July 2016

सठे साठ्यम् समाचारेत् ....



सठे साठ्यम् समाचारेत् ....

        हमारी गली में कई कुत्ते हैं लेकिन एक कुत्ता हर बाइक व साइकिल सवार के पीछे दौड़ता है कुछ को काट भी चुका है ! मगर एक महिला उस कुत्ते पर पलटवार करने वाले को गालियाँ देने से बाज नहीं आती !!
        लोग उस महिला से कहते हैं कि अगर इस कुत्ते से इतना ही मोह है तो इसे बाँध कर रखो तो इस पर वो उस कुत्ते के स्वामित्व से मुकर जाती है ! बड़ी विकट स्थिति है !!
        खैर ! रोज की तरह मैं बाइक पर निकला मगर उस दिन तथाकथित मालकिन और कुत्ते दोनों को सबक सिखाने मूड में था ! ज्यों ही कुत्ता मेरे पीछे दौड़ा ! मैंने कसकर डिस्क ब्रेक खींच दिए ! अचानक बाइक रुक जाने से मेरे पीछे बदहवास सा दौड़ता कुत्ता अवाक सा बाइक के पास ही ठहर गया ! बाइक पर बैठे -बैठे " सठे साठ्यम् समाचारेत् " की रीत पर मैंने उसको मौका दिए बिना तुरंत उसकी थूंथन पर पैर से प्रहार कर दिया ! अचानक प्रहार से विचलित कुत्ता संभलने में असमर्थ था ! वापस भागा ! तथाकथित मालकिन मेरे तेवर देखकर स्तब्ध थी !! कुछ न बोल सकी !!
      अब वो कुत्ता मेरे पीछे काटने को नहीं दौड़ता है !
      विवेकानन्द जी ने भी कहा है, " भागो मत ! पलटो और मुकाबला करो ! "
सोचता हूँ, मंच कोई भी हो, मिथ्या, तथ्यहीन, अनर्गल प्रलाप पर मौन साध लेना और सही को सही कह सकने की हिम्मत न जुटा पाना भी विपरीत आचरण को उत्साहित करने जैसा ही कृत्य है।

बुरा जो देखन मैं चला,..



बस यूँ ही बैठे ठाले-ठाले ...

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोये।
जो मन खोजा आपना, तो मुझसे बुरा न कोये॥
 
          सोच रहा था !! हम यहाँ फेसबुक पर दिन-रात ज्ञान बांटते हैं.. सरकार किसी की भी हो लेकिन व्यवस्था में, समाज में.. ढेरों कमियाँ खोजकर सरकार को कोसने व समस्याओं पर बढ़-चढ़कर बहस करने में भी हमें महारत हासिल है ! तारीफ़ का हुनर भी हम सभी में खूब है !!
         हम सभी की आदर्शवादी पोस्ट्स से महसूस होता है जैसे हम सभी फेसबुक यूजर भगवान् स्वरुप हैं .. फिर भी अव्यवस्था !!
       खैर .. लोकतंत्र है सब चलेगा ! लेकिन फिर भी सोचता हूँ कि हम मानव हैं .. भगवान् नहीं !! कमियाँ हम सभी में हैं बेशक उनका स्वरुप अलग-अलग हो सकता है.
       जिस तरह हम दूसरे में कमी खोजते हैं या दोषारोपण करते हैं क्या हम उसी तर्ज पर अपनी व्यक्तिगत कमियों, अवगुणों या दोषों को भी सहजता से स्वीकार कर उन पर चर्चा कर सकने का साहस और आत्म सुधार की व्यक्तिगत मन: स्थिति रखते है !!
या यूँ ही "फेसबुक बाबा" के रूप में कॉपी-पेस्ट और वाल पेपर पोस्ट करके निठल्ला ज्ञान ही बांचते रहेंगे ....
       सोचता हूँ सवा अरब की आबादी के देश में " शिकायती फोंपू " बनने से बेहतर है कि उपलब्ध संसाधनों से व्यक्तिगत स्तर पर स्वयं के चिड़ि प्रयासों द्वारा आदर्श प्रस्तुत किए जाएं. इस तरह समाज में सकारात्मक सोच अवश्य विकसित हो सकती है।
                              हम सुधरेंगे... जग सुधरेगा .. हम बदलेंगे.. जग बदलेगा ..